गुरुवार, 24 नवंबर 2016

भीतर के क्लॉड इथरली को जिंदा रखें

क्लॉड ईथरली कौन है। शोर शराबे की मार्का बेइमानगिरी में ईमान का मर्ज है क्लॉड ईथरली । ये वो बीमारी है अगर लग जाए को तो आदमी बेकार हो जाता है। वो किसी के काम का नहीं रहता । ना खुद का। ना परिवार का और ना ही समाज का । मर्ज अगर ज्यादा बिगड़ जाए तो जगह सिर्फ दिमाग का इलाज करने वाले अस्पतालों और पागलखानों में ही मिल सकती है ।

तो भई अब पूछा जाएगा कि जिस मर्ज का इतना जिक्र हो गया उसका आगा पीछा , हिंदी नाम वाम भी तो पता चले । क्लॉड ईथरली दरअसल मुक्तिबोध की वो कहानी है जिसमें वो इंसाफपसंद बेचैनी को इतिहास के एक कैरेक्टर के जरिए पल्ले पड़ाने की जुगत लगाते हैं ।


मर्ज है कि कहानी है, नाम तो किसी इंसान का लग रहा है । सही है दरअसल क्लॉड इथरली दरअसल एक वास्तविक दुनिया के वास्तविक शख्स का ही नाम है। जिसकी कहानी कुछ अवास्तविक से पड़ावों से होकर गुजरी ।  दरअसल क्लॉड ईथरली वो ही शख्स था जिसने अमेरिका के लिए हीरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बरसाए थे । कहने को तो वो देश का काम कर रहा था। दुश्मनों के खिलाफ़ अपने देश के लिए महान काम कर रहा था लेकिन इस राष्ट्रभक्ति  के काम ने उसकी अंतरात्मा में ऐसा लोचा पैदा कर दिया जिसने मरते दम तक  उसका पीछा ना छोड़ा । अपनी आत्मा की बेचैनी से छुटकारा पाने के लिए और वॉर हीरो की इमेज तोड़ने के लिए उसने क्या क्या ना किया । युद्ध से प्रभावित हुए बच्चों की मदद की, छोटे मोटे
उठागिरी टाईप अपराध भी किए लेकिन कोकुछ काम नहीं आया । आत्मा पर आए इस बोझ ने उसके व्यक्तित्व को कहीं भीतर कुचल ,दिया वो मानसिक संतुलन खो बैठा और 1978 में उसकी मौत हो गई ।

आत्मा की बेचैनी के कई प्रकार भी होते हैं ...सबसे खतरनाक प्रकार की स्टेज क्लॉड इथर वाली होती है । इसलिए इंसान को चाहिए कि किसी भी इज्म को खुद पर इतना ना हावी होने दे कि उस वैचारिक जमीन पर पागलपन के पौधे उगने लगें ।
अपने भीतर के ज़मीर यानि क्लॉड इथरली को जिंदा रखें । तभी दिल और दिमाग दोनों स्वस्थ रह पाएंगे ।







शुक्रवार, 17 जून 2016

थैंक्यू और प्लीज़....

दुनिया जिस दौर में होती है, उसमें अपनी ही रवानगी और रफ्तार से चलती है.....आज तकनीक और मशीन का युग है ...भावनाएं और अभिव्यक्तियां तक डिजिटल हो गईं है। सबको पता है
इंटरनेट पर अब सब कुछ मिलता है...बस टाइप करना है और सूचनाओं की एक लंबी चौड़ी कतार आपके सामने तैयार ...अरबों लोग दुनिया के हर कोने से हर पल ना जाने क्या- क्या इंटरनेट पर खोज
रहे हैं । सालों से , सांस लेने की ही रफ्तार से हो रहे इस मशीनी काम में एक दिन मानवीय स्पर्श किसी ठंडी हवा के झोंके की तरह आया...और मशीनी तरीके से चल रहे सिस्टम को प्यार से सहला गया ।
गूगल के सर्च इंजन पर एक रिक्वेस्ट आई...जो रोज़मर्रा की रिक्वेस्ट से अलग थी....जानकारी मांगने वाले सर्च की एवज में प्लीज़ और थैंक्यू कहा......ये फरियाद थी लंदन में रहने वाली 86 साल की एस्वर्थ की...
  एस्वर्थ ने सर्च इंजन में  लिखा कि प्लीज क्या आप रोमन न्यूमरल्स mcmxcviii के बारे में बता सकते हैं, थैंक्यू । एस्वर्थ को अपने सवाल का जवाब तो मिला साथ ही एक संदेश
गूगल की तरफ से उनके लिए आया कि लाखों-करोड़ों की खोज में आप का सवाल खुशी देता है... लेकिन इसके लिए आप को थैंक्यू कहने की जरुरत नहीं है।
ये पूरी कहानी तब सामने आई जब एस्वर्थ के नाती अपनी नानी के इस मासूम से अंदाज़ को सोशल मीडिया पर डाल दिया जिसके बाद मासूमियत का ये अफसाना जगजाहिर हो गया । एस्वर्थ उम्र के इस पड़ाव
में अपना ज्यादातर वक्त टीवी देखते बिताती हैं । ब्रिटेन में सीरियल्स में दिन, महीने और वर्ष की जानकारी देने के लिए रोमन नंबर का इस्तेमाल किया जाता है। एस्वर्थ ने किसी प्रोग्राम को देखा था और उन रोमन नंबर्स को नहीं समझ पायी।
 लिहाजा उन्होंने गूगल सर्च इंजन में सवाल टाइप कर जवाब जानना चाहती थीं।


खलील जिब्रान ने कहा है कि जो कुछ तुम्हारे पास है,उसे एक न एक दिन तो देना ही पड़ेगा  ,तो फिर आज ही दे दो ..यह बात कृतज्ञता के भाव पर सही बैठती है...हमारी सदी ने बहुत कुछ हासिल किया....दुनिया का एक छोर दूसरे छोर से जुड़ा
हुआ है ....लेकिन अगर कुछ खो गया है तो वो कृतज्ञता है...ग्रैटीट्यूड खो गया है ...जीवन की सहज लय बिगड़ गयी है...  उतावल ने उसे असहज बना दिया । इसीलिए हमारी शैली मशीनी हो गई .. प्रतिक्रियावादी हो गई है ...
एस्वर्थ बुजुर्ग हैं वो जिस जमाने से आती हैं वहां कृतज्ञता सिखाई नहीं जाती थी....वो जीवन में सहजता से ऐसे ही साथ चलती है जैसे सांसों की डोर...आज सब कुछ हासिल करने...सब कुछ अनुभव की जल्दबाज़ी ने जीवन से उसका सत्व कहीं छीन लिया है...
इसीलिए एस्वर्थ की मासूमियत  खबर बनती है..क्योंकि जीवन का ये कोमल भाव ...जिसे भी छूता है उसे ठहरने और उसे महसूस करने के लिए विवश करता है...बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद का ये दौर अपनी संवेदनहीनता और अमानवीय
चेहरे के लिए बदनाम है ... लेकिन इसी दौर में अगर महज एक सर्च रिक्वेस्ट को लेकर इतनी बात की जाती है तो समझ जाइए....कोई भी युग हो...कोई भी वाद हो...मानवता के कोमल भावों के तंतु कभी ढीले नहीं पड़ सकते ...वो रोज
की आपाधापी में मन की परतों में कहीं दब ज़रुर गए हैं लेकिन मौका मिलने पर ऐसी ही खबरो के जरिए सामने आते हैं...आते रहेंगे...जरुरत है ...इन सहज भावों को और खाद पानी देने की ..मानवीय ऊर्जा की गर्मी देने की ...ठहरने की...ठहर
 कर सांस लेने की ..जीवन को अपने अर्द गिर्द महसूस करने की ...और इस धरती का एक जीवंत भाग बनने की... फिर एस्वर्थ की रिक्वेस्ट जैसी खबरें...खबरें नहीं बनेंगी ....चौकाएंगी नहीं।

रविवार, 12 जून 2016

खामोश चीख का शोर




जिंदगी का ऐसे किसी मोड़ से निकलना,जहां से ज़िंदगी के कई साल न सिर्फ मुड़ न जाएं..बल्कि हाथ से निकल जाएं ...फिसल जाएं ...और आप स्तब्ध खड़े रह जाएं ..चुपचाप...। सब कुछ ऐसे हो कि किसी से ना गिला कर पायें और न ही शिकायत ।  ऐसा एक शख्स के साथ हुआ ।

23 साल वो सलाखों के पीछे रहा । एक दिन उसे कहा गया कि तुम बेकसूर हो । 20 साल का वो नौजवान एक पल में 43 साल का अधेड़ हो गया । जिंदगी के दिन ,महीने ,साल कहीं फास्टफॉर्वर्ड में आगे निकल गए और वो कहीं पीछे रह गया । ज़िंदगी की छत से मानो जैसे ही वो उन सालों को नीचे देखने की कोशिश करता उसे अंधेरा ही दिखता । निसार उद दीन अहमद को 23 साल पहले बाबरी मस्जिद विध्वंस की पहली बरसी पर हुए धमाको के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था । फार्मेसी का ये छात्र 23 साल तक जेल में रहा लेकिन पुलिस को उसके खिलाफ़ सबूत नहीं मिले

अब जरा निसार को सुनिए -----आज मैं 43 साल का हूं । उस वक्त मेरी छोटी बहन 12 साल की थी जिसकी अब शादी हो चुकी है...उसकी बेटी 12 साल की है मेरी भतीजी.. एक साल की की थी लेकिन अब वो भी शादीशुदा है । मेरी ज़िंदगी में एक पूरी पीढ़ी गायब हो चुकी है । ऐसा क्यों हुआ ? कब हुआ मैं नहीं जानता । बस ये जानता हूं कि मेरे लिए ज़िंदगी खत्म हो चुकी है । मैं निसार खान हूं और एक ज़िंदा लाश हूं ।

निसार की कहानी पढ़ सुन कर ये व्यक्त करना मुश्किल है कि कि कैसा महसूस होता है । गुस्सा,खीज,दुख या इनसे उपजी एक खामोशी भरी बेचैनी । एक शख्स कहता है कि उसकी ज़िंदगी के 23 साल व्यवस्था की भेंट चढ़ गए...और इस बात का गवाह हर कोई था । समाज, कानून सब । निसार सही कहता है जब वो कहता है कि
वो समझ नहीं पा रहा कि वो खुद एक सच्चाई है या अफसाना । जिंदगी कोई गाने की डीवीडी तो नहीं जिसे रिवाइंड कर वो मनपसंद गाना सुन ले ...क्या कोई इस शख्स के उन जवान लम्हों को वापस ला सकता है जिनमें ज़िंदगी की खूबसूरती महसूस करने की ख्वाहिश कभी रही होगी । ये सही है कि वो खुशकिस्मत है क्योंकि कई लोगों को जीते जी इंसाफ़ कभी हासिल नहीं हो पाता..23 साल बाद ही सही वो जेल की सलाखों से बाहर है और खुली हवा में सांस ले रहा है । सवाल ये है कि क्या ये सही इंसाफ़ है कि किसी
से उसकी संभावनाओं से भरा जीवन छीन लीजिए कहिए लीजिए अब आप आज़ाद हैं...जियो अपनी ज़िंदगी  । इसीलिए  निसार की खामोश आंखों की ये चीख
कि मैं एक ज़िंदा लाश हूं ...कान फाड़ देता है । 

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

क्या कहां खो रहा है




एक 100 रुपये का नोट एक ज़िंदगी पर  भारी पड़ गया । बचपन में
ओ हेनरी की कहानियां सबने पढ़ी होंगी । इंसानी जज्बे और दुनियावी ज़रुरतों
के ताने बाने से लिपटी कहानियां । जहां अपनी प्रेमिका के खूबसूरत बालों
के लिए कंघी गिफ्ट करने के लिए प्रेमी अपनी सबसे प्यारी चीज़ बेच देता है तो पता
चलता है कि उसे गिफ्ट देने के लिए उल्टे प्रेमिका ने ही अपने बालाों की कुर्बानी
दे दी । भावनाएं छोटे भौतिक सुखों से कहीं आगे चलीं जाती हैं । कल्याणपुरी के
शिवम को अब ये बात समझाई नहीं जा सकती कि भावनाओं के
आगे भौतिक चीज़ों का कोई मोल नहीं । 18 साल का शिवम अब इस दुनिया में नहीं है ।

18 साल के एक लड़के ने अपने घर की पहली मंजिल पर जा फांसी लगा ली ।
वजह बनी महज एक 100 रुपये का नोट । शिवम को 100 का वो नोट उसके पिता ने दिया था , किसी काम के लिए। उस 100 के नोट में शिवम ने शायद खुद को ही खो दिया । सवाल ये कि उसकी मौत की वजह
क्या थी । 100 रुपये के नोट की शक्ल में पिता का डर ।
या फिर इस पीढ़ी का वो उलझाव जो कभी किसी प्रत्यूषा या फिर
कभी हरियाणा की उन दोनों बहनों की खुदकुशी की शक्ल में सामने आता है जिन्होंने
नौकरी न मिलने की वजह से खुदकुशी कर ली । ज़िंदगी खत्म करना जीने से ज्यादा आसान क्यों
होता जा रहा है । नई पीढ़ी जीने से पहले ही जीवन के आखिरी पड़ाव पर क्यों जा रही है ।
सोचना होगा सबको ।

शनिवार, 19 मार्च 2016

मुखौटे


ऑस्कर वाइल्ड ने एक जगह कहीं लिखा है कि कभी कभी सच के पीछे जाने के लिए मुखौटे पहनने पड़ते हैं । मुखौटे । इस शब्द में ही एक रहस्य सा है , मिस्ट्री और सस्पेंस के उस नॉवेल की तरह जिसके आखिरी पन्ने को बार-बार पढ़ने का मन करता है , किताब खत्म करने से पहले ही । उन दराज़ों को खोलने की चाहत की तरह जिसे   चाबी से  बंद किया जाता है , कभी ना खोलने के लिए ।
इसी तरह मुखौटे के पीछे क्या है इसे जानने की इच्छा मेक्सिकन घोड़ों की रफ्तार की मानिंद ऐसी होती है कि उस पर लगाम के लिए खुद मुखौटा पहनना पड़ता है । बनना पड़ता है । कॉफी हाउस में आखों में आखें डाल बातें करते कपल हों , बाज़ार में दुकानों में सामान बेचते सेल्समेन, या फिर  घरों की चारदीवारी में पति -पत्नी,मां -बेटा, भाई बहन ध्यान से देखिए मुखौटे सबने लगा रखे हैं । शेक्सपियर ने कहा था कि दुनिया एक रंगमंच है और हम सब अभिनय करते अभिनेता । इस दुनिया के थियेटर में लोग अपने किरदार
मुखौटे पहन कर ही अदा करते हैं । जो जितना मोटा और गहरा मुखौटा लगा पाए वो ही ज्यादा बढ़िया अभिनेता । आप किसी के बारे में सोचते क्या हैं ? ये उसको पता
 लगे अगर इसमें फायदा है तो यकीनन ताउम्र मुखौटे से ही सामना होगा। कभी-कभी अहम की मोटी परत भी मुखौटे की वजह बनती है । कोई किसी को पसंद करता है
लेकिन अगर दिल में अहम भाव है या फिर दुनिया का डर तो मुखौटा ही सामने आएगा । लेकिन ऐसा नहीं है कि मुखौटे की कोई काट नहीं । दरअसल मुखौटे की असल काट मुखौटा ही है । मुखौटा ही मुखौटे का जवाब है । ज़हर की ज़हर से काट की तरह वाली युक्ति यहां भी काम करती है । दिन का कोई पल तो वो होगा ही जब मुखौटा गिरेगा ही और असलियत सामने आ ही जाएगी । अब ज़रुरी नहीं कि ये असलियत हमेशा दुख देने वाली भी हो । कई बार अपनी अंतरंग भावनाओं को चोटिल होने से बचाने के लिए मुखौटे को एक कवच की तरह इस्तेमाल किया जाता है । बाहरी आवरण  के ज़रिए मन की कोमलता और दुर्बलता सबके सामने ना आ जाए इसके लिए कृत्रिम चेहरा,हाव भाव सब का सहारा लिया जाता है । लेकिन जैसे कि हर नाटक का अंत होता है ऐसे ही किसी दिन अभिनय का मुखौटा गिर पड़ता है । और इंसान को पता तक नहीं चलता ।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

काश तुम इसे राज़ ही रहने देती रोज़ ।


1997 का साल । दुनिया भर में धमाल मचा चुकी प्रेम-कहानी टाइटैनिक सिनेमा घरों में थी । फिल्म के प्री क्लाइमेक्स का एक सीन जिसने प्रेम कहानी को दुखांत दिया 
उसका दर्द बरसो तक दुनिया भर के लोगों को सालता रहा । बर्फीले समंदर के हाड़ जमा देने वाली पानी में जान बचाने की कोशिश करते जैक और रोज़ । शिप से ही टूटे 
 लकड़ी के एक पट्टे पर जिंदगी बचाने की जद्दोजहद । अपनी प्रेमिका को लिटा जैक खुद पानी में ही रहता है क्योंकि लकडी का वो पट्टा दो लोगों की जान बचा नहीं सकता ।
 ठंड से हाइपरथर्मिया में जैक की मौत हो जाती है । हॉल से निकलते वक्त न जाने कितने दर्शक घर जाते-जाते ये बात सोचते रहे क्या जैक को बचाया नहीं जा सकता था ?
 क्या उस पट्टे पर दो लोगों को संभालने की जगह नहीं था ? क्या रोज़ ने जैक को बचाने की पूरी कोशिश की थी ? और फिल्मी प्रेम कहानियों के शौकीन आखिर में खुद को समझा
 ही लेते हैं कि वाकई इस प्रेम कहानी में कोई मिलावट नहीं थी , न ही रोज़ की मुहब्बत में । क्लाइमेक्स ऐसा ही था जैसा किसी प्रेमकहानी का होना चाहिए । 
 फिल्म एक क्लासिक आइकॉनिक बन गई और मूलत गैर रोमांटिक फिल्मों के लिए मशहूर हॉलीवुड को एक बंबईया फिल्म टाइप लवस्टोरी दे गई 

अब इतने सालों बाद फिल्म में रोज़ की भूमिका निभाने वाली केट ने भी माना है कि फिल्म एक दुखांत से बच सकती थी । फिल्म में जैक को बचाया जा सकता था ।
immy Kimmel live नाम के एक शो में एक सवाल के जवाब में केट खुलकर ये बात मानी कि जो सवाल दर्शकों के मन में इतने सालों से है उस ने
 उनके ज़हन को भी बेचैन किया है । अगर फिल्म की नायिका ऐसा सोचती है तो फिर क्योंकर डायरेक्टर जेम्स कैमरुन ने इस तरह के क्लाइमेक्स का चुनाव किया , 
वजह कैमरुन ने 2012 में दिए अपने एक साक्षात्कार में दी भी कि जैक की मौत  फिल्म की स्क्रिप्ट की डिमांड थी ।जिससे बचा नहीं जा सकता था ।
 साफ है कैमरन जानते हैं कि सदियों से साहित्य और सिनेमा में दर्ज उन्हीं प्रेम कहानियों ने असर छोड़ा है जो अधूरी रही हैं, जिन्हें दुखांत हासिल हुआ । 

लेकिन अब जब केट विंसलेट ने कहानी के उस मोड का ज़िक्र किया जहां से क्लाइमेक्स बदल भी सकता था तो एक ज़माने से  फिल्म को कल्ट लव स्टोरी मानने वाले दर्शक 
खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं कि अफसाना चाहे झूठा ही सही , सुखद तो था , उसमे एक यूटोपियन रोमांटिसिज्म तो था । सच्चाई तो वैसे ही कड़वी होती है 
कम से कम किस्से कहानियों की दुनिया तो पर्दानशीं ही रहने दिया होता । फिल्म देखकर बड़े हुए लोग इसे एंड ऑफ इनोसेंस के फेज़ की तरह देख रहे थे । ये बचपन के दौर से 
बाहर आने की तरह ही है । तो माई डियर रोज़ अच्छा होता कि आप राज़ को राज़ ही रहने देंतीं । ये तो कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ कि हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन...

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

क्योंकि ये पल तो जाने वाला है



एक पल । यूं तो कहने को हर रोज 24 घंटे में हम कितनी पल देखते हैं । सुनते हैं । हर पल कुछ कर रहे होते हैं ...कुछ बना रहे होते हैं तो
कुछ यूं ही गवां रहे होते हैं । सागर के विस्तार जैसे इस वक्त के समंदर  से धीरे-धीरे इसी तरह ये मोती जैसे पल रोज़ाना कैसे हाथों से फिसल जाते हैं ...और काल
की रेत में समा जाते हैं बिना किसी वजूद के । इन गंवाएं पलों पर किसी तरह की छाप भी नहीं होती न कोई रंग होता है न इनका कोई स्वाद और
न ही कोई गढन । रीते ...खाली ...सूने ऐसे ही होते हैं ये पल जो शाख से किसी पत्ते की तरह गिर जाते हैं ।

तो ये लाज़िम है कि ऐसे किसी भी पल को गंवाया जाए न । कुछ भी उसके साथ किया जाए । पर गंवाया जाए ना । क्यों न उस पल को गुनगुनाया
जाए ...सिला जाए खूबसूरत ख्यालों की पैहरन की तरह ...धुनों से या फिर लफ्जों से । उस पल में रंग भरे जाएं कुछ खूबसूरत रंगीन ख्यालों के ।
इंसानियत और प्यार के ज्जबे से लबरेज  उस पल को एक कंबल बना कर ओढ़ा जाए और रुहानियत महसूस की जाए । क्यों न एक कहानी या
कविता लिखी जाए ....। वो कहानी जिसका पहला पन्ना इंकलाब तो आखिरी पन्ना एक ऐसी दुनिया की परिकल्पना हो जो खूबसूरत हो, समान हो
न्यायपूर्ण हो । क्यों न उस पल को उस खूबसूरत कविता बना दिया जाए जो सूरज की रोशनी और फूलों की खूशबू से ज़िंदगी को गुलज़ार करती हो ।

आओ दोस्तों उस पल को यूं न जाने दो । न रितने दो । न गंवाओ । उस पल को जो तुम चाहे वो बनाओ

शनिवार, 30 जनवरी 2016

क्योंकि ये शायर पल दो पल पल का नहीं

बॉलीवुड में गीतकार बहुत हुए । हर ज़माने में उम्दा से उम्दा शायरी लिखी गई । जीवन और उसके रंगों को गीतों को शक्ल देने का काम भी बखूबी हुआ । लेकिन जो बात साहिर में थी शायद किसी में ना थी । साहिर अपनी तरह के अनूठे शायर हुए । वो पल दो पल के शायर कतई नहीं थे । वो अपनी शर्तों पर जीने वाले ,अपनी शर्तों पर लिखने वाले थे । "जला दो इसे फूंक डालो ये दुनिया '' लिखने वाला शख्स किस तरह इस दुनिया के खोखलेपन को नंगा करने के लिए किन आंतरिक संघर्षों से गुज़रता होगा ज़रा सोचिए ।                                                                   

एक कहानी सुनिए बात इसी फिल्म के एक शो की है ,मुंबई के मिनर्वा टॉकीज़ में फिल्म दिखाई जा रही थी जैसे ही "जिन्हें नाज है हिंद पर " गाना शुरू हुआ , तो दर्शक सीट से उठ खड़े हुए और गाने के खत्म होने तक हॉल तालियों के शोर से गूंजता रहा । दर्शकों की मांग पर इसे तीन बार और दिखाया गया । फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास में शायद ऐसा पहले नहीं हुआ । साहिर  हिन्दी फिल्मों के ऐसे पहले गीतकार थे जिनका नाम रेडियो से प्रसारित फरमाइशी गानों में दिया गया, इस तरह वे पहले गीतकार हो बन गये जिन्होंने गीतकारों के लिए रॉयल्टी का इंतजाम कराया ।  पहले किसी गीतकार को रेडियो से प्रसारित फरमाइशी गानों में श्रेय नहीं दिया जाता था।

अब जबकि संजय लीला भंसाली साहिर पर फिल्म बनाना चाहते हैं तो किसी को आश्चर्य ही नहीं हुआ । साहिर की ज़िंदगी को अगर फिल्म की शक्ल दी जाए तो उसका हर एक फ्रेम ऐसे रंगों से लबरेज़ होगा जो हर एंगल से रौशन और खूबसूरत है । भंसाली कहते हैं कि वो निजी जीवन में साहिर से खुद बहुत प्रभावित रहे हैं और उनकी फिल्मों में प्रेम और सूफियत को लेकर जो एक छायावाद किस्म का रोमांटिसिज्म है वो साहिर की ही देन है । भंसाली की बातों में दम हो सकता है । ये सही है कि साहिर क्रांति के कवि थे जिनकी नज्मों के केंद्र में मजलूमों की बेबसी और सियासत और समाज का क्रूर चेहरा  था । लेकिन आखिरकार वो प्रेम के ही शायर रहे । वो प्रेम जो अपने में क्रांति, साहस ,संवेदनशीलता और इंसानी जज्बे के उजले पक्ष को खुद में समेटे था ।

भंसाली की फिल्मों में भी प्यार का रंग ऐसा ही उज्जवल दिखाया गया है । इश्क ऐसा हो कि वो पाकीज़गी के उस समंदर की तरह हो जाए जिसमें इंसान डूब कर ही मंज़िल पा जाता है । 'बाजीराव मस्तानी ' में दोनों प्रेमियों की मंज़िल एक ऐसी दुनिया की कहानी है जहां धर्म और जाति की दीवारें प्रेम की राह को संकरी न बना पाएं तो ' रासलीला ' में प्रेम के आगे ज़िंदगी ही छोटी दिखने लगती है ।  फिल्म ' ब्लैक ' और ' गुज़ारिश ' प्रेम के एकदम जुदा सिरे को ही पकडते हैं । लेकिन सभी फिल्मों के मूल भाव में प्रेम ही है ।

साहिर की ज़िंदगी में भी प्रेम तो हमेशा रहा लेकिन दुनियावी मंजिलें हासिल न हो पाई । उनका और अमृता प्रीतम का प्रेम समझने के लिए दुनियावी नज़र को पार रख कर देखना होगा । दो साहित्यका्रों का प्रेम ऐसा ही था अव्यक्त लेकिन अधूरा नहीं । सृजन के लिए जिस बौद्धिक ज़मीन की ज़रुरत होती है वो ऐसे ही रिश्तों में सामने आती है । दुनिया की नज़र में जो प्रेम अधूरा रह गया उसे साहित्य की शक्ल में एक प्रेरक ठंडी छांव नसीब हो गई थी । यूं कहा भी जाता है कि असल में सृजन की राह ऐसे ही जज्बातों का सफर तय करती है । 


साहिर की ज़िंदगी में सुधा मल्होत्रा नाम की एक गायिका भी आई पर शादी दोनों से ही न हो पाई । धर्म आड़े आया । साहिर की ज़िंदगी अपने आप में एक अनूठी प्रेम कहानी है जिसे भंसाली ने अपने ही तरीके से अलग-अलग फिल्मों की सेंट्रल थीम बनाया ।


 साहिर पर फिल्म बनना ज़रुरी है । बहुत जरुरी है ताकि आज की नई पीढ़ी उस दौर को , उस शख्सियत को समझे । वो जाने एक शायर की कहानी । ये भी जानें कि ये शायर पल दो पल का नहीं था । अपने गीतों के ज़रिए समाज की जिस गंदगी की ओर ध्यान दिलाना चाहता था वो आज ज्यादा बदबूदार है । आम आदमी की मजबूर सांसें आज भी सियासत के फंदे में कैद हैं । लेकिन रास्ता सिर्फ संघर्ष ही है । एक शायर की शक्ल में साहिर का जीवन इन्हीं सवालों और जवाब पाने के संघर्ष से घिरा रहा । वो शायर जो अपने फन में माहिर था , जो सवाल उठाता था,जो जवाब मांगता था । आज की पीढ़ी के सामने  हीरोज़ की कमी है । वो प्रेम , करूणा , साहस से जीवन जीने वाले लोगों को नहीं जानते । ज़रुरी है कि वो साहिर को जानें ।

क्योंकि साला खडूस सिस्टम के लिए ज़रुरी है

दो फिल्मे बैक टू बैक । आइडिया बुरा नहीं था । बस सुबह उठना पड़ा । उससे पहले फिल्म के टिकट रात को ही बुक करने पड़े। तो वीकेंड पर दो फिल्में ऐसे ही देखी । एयरलिफ्ट पहले शो में बाद में साला खड़ूस । पहली फिल्म की तारीफें सुन रखीं थी और दूसरी मैं देखकर तय करना चाहती थी कि फिल्म कैसी है । पहली फिल्म एवरेज और दूसरी एवरेज से भी नीचे । दो अलग कहानियां उन कहानियों में उलझे किरदार और उनकी कशमकश को सुलझाता जुदा जुदा स्क्रीन प्ले । सब कुछ अलग कुछ साम्य नहीं सिर्फ एक बात
 और वो ये कि बने बनाए...रटे रटाए एक लीक पर चलते सिस्टम में कई बार कुछ कलपुर्जे अलग वजूद अख्तियार कर लेते हैं जैसे किसी पेड़ के इर्द गिर्द उमजा एक नन्हा पौधा जो वक्त आने पर कई ऐसे काम आने लगता है जैसे कभी वो बड़ा पेड़ आया करता था एयरलिफ्ट कहानी है एक कुवैत में हुए एक एवैक्यूएशन ऑपरेशन की जिसको लेकर विवाद खूब हुए कि सरकार की भूमिका सही तरीके से नहीं दिखाई गए ...वगैरह वगैरह । वहीं दूसरी कहानी है स्पोर्टस में फैले भ्रष्टाचार और दूसरी गंदगियों के बीच धुन के पक्के,काम के
माहिर दो स्पोर्टसपर्सन्स की । जिसमें एक मुख्य किरदार को साला खडूस के नाम से दुनिया जानती है ।ठीक है वो खड़ूस है क्योंकि वो सच्चा है उसमे मिलावट नहीं । जब इंसान किसी हुनर को ज़िंदगी मान बैठता है और अपने काम को दुनिया तो वो बाकी दुनिया के लिए खडूस हो जाता है । क्योंकि ये दोनों धाराएं अलग-अलग चलती हैं । ट्रैक एक ही होता है और उस पर ही नज़र जमाए रखने  के लिए हुनर को इबादत बनाना होता है और इसके लिए बाहर का दुनियावी मुलम्मा उतारना पड़ता है । इसी लिए कोई कोई शख्स इस टाइटल से नवाज़ा जाता है साला खडूस । वहीं कुछ-कुछ यही बात दूसरी कहानी पर भी लागू होती है । हर सिस्टम
में चाहे देश काल कोई भी हो कुछ लोग (चाहे उन सरोकारों से उनका सीधा राब्ता भी न हो ) अलग चलते हैं ..सही लीक पर चलते है लकीर के फकीर नहीं बनते और ऐसे ही लोग सिस्टम के वाकई चलने के लिए भी ज़िम्मेदार हैं । जैसे की फिल्म एयरलिफ्ट में में ज्वाइंट सेक्रेटरी का काल्पनिक किरदार । ऐसे अनसंग,अनहर्ड हीरोज की तरह जिन्हें वाकई किसी वाहावाही या तारीफ की जरुरत तक  नहीं होती । वो हैं क्योंकि अच्छाई का वजूद है । तो ये वही खडूस है जिनके दम पर सिस्टम खुद के होने का दम भरता है ।

शनिवार, 19 दिसंबर 2015

देखें....आखें न चुराएं

टीवी पर एक विज्ञापन आप सभी ने देखा होगा । जिसमें एक लड़का अपनी सहकर्मी से कहता है-हम कमाएंगे कब और अच्छा काम करेंगे कम । मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर कंपनी
के विज्ञापन में तो इंटरनेट फोन में ट्रांसफर कर अच्छे काम की इतिश्री कर ली जाती है । लेकिन आम तौर पर हम सोचते हैं कि जब तक जेब में पैसे नहीं होंगे तो कैसे समाज के
लिए कुछ कर सकते हैं । शायद यही वजह है कि कई लोग समाज के लिए अपना फर्ज निभाना चाहते हैं लेकिन दुनियावी सोच आड़े आ जाती है । सोचते हैं अभी ये जोड़ लें
अभी ये कर लें फिर कुछ अच्छा काम करेंगे । लेकिन राजस्थान के एक छोटे से गांव के एक शख्स ने जो किया उसने इस दुनियादारी की संकीर्ण गली में एक छोटी सी
लेकिन उजियारी खिड़की खोली है। बात हो रही है जयपुर से 70 किमी दूर शाहपुरा में रहने वाले हनुमान सहाय की । इनकी रोज़ी रोटी एक छोटी सी दुकान से चलती है जहां ये
सूखी चायपत्ती बेच गुज़ारा करते हैं । इस साधारण से शख्स ने ऐसा कुछ किया जिसे न सरकार न प्रशासन कोई नहीं कर पाया । इन्होंने गांव के लिए एक सरकारी अस्पताल बनवाया है
अपने बूते । इसके लिए इन्हें अपना घर तक बेचना पड़ा और 1 करोड़ इकट्ठा कर एक 27 बेड का अस्पताल बनवा डाला । लेकिन एक साधारण सी गुज़र बसर
करने वाले इस शख्स ने भला ऐसा क्यों किया । कहानी छोटी सी है और अमूमन हर शख्स का कभी न कभी ऐसे हालातों से पाला पड़ता है जब आपकी आँखों
के सामने कुछ ऐसा घट जाता है जो न सिर्फ मन पर  बल्कि दिमाग पर भी चोट करता है । रेडलाइट सिग्नल पर भीख मांगते बच्चे, कड़ाके की ठंड में भी फ्लाइओवर , फुटपाथों
पर रात काटती मजबूर ज़िंदगियां।ये कुछ ऐसी सच्चाई है जो एकदम से आंखों के सामने आ जाती है, दिल में कसक पैदा करती हैं । चेतना कह उठती है कि इन
ज़िंदगियों को जीने लायक बनाने के लिए कुछ तो करना चाहिए । लेकिन अकसर ऐसी इच्छाएं सिग्नल पार करने के बाद रोज़ाना का जीवन जीने की जद्दोजहद में कही दब जाती हैं । गुम हो जाती
हैं । लेकिन कुछ लोग हैं जो ऐसे वाक्यों को भुला नहीं पाते और वहीं से शुरु होती है कुछ अच्छा कर गुज़रने की पहली सीढ़ी । हनुमान सहाय अपने पिता से मिलने गांव आए
वहां एक महिला को प्रसव पीड़ा हुई । दिक्कत ये कि आस पास कोई अस्पताल था ही नहीं । काफी देर ये महिला इसी  तरह तड़पती रही और किसी  तरह दाई की मदद से
घर में ही बच्चे ने जन्म लिया । हनुमान वहां से अपने घर आ गए लेकिन उस महिला की मजबूरी को वो भुला नहीं पाए तय किया कि वहां अस्पताल बनाएंगे. कैसे करेंगे उन्हें
नहीं मालूम था लेकिन इतना ज़रुर पता था कि अस्पताल तो बनाना है । रास्ते में दिक्कत आई, पैसा बड़ी समस्या था ,जिसके लिए उन्होने घर तक बेचा लेकिन आज उनका सपना पूरा हो गया है ।
अस्पताल अपनी जगह पर हैं । वहां डॉक्टर और नर्स भी सेंक्शन हो गए हैं ।

हममे से अधिकतर लोग समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं,लेकिन वो क्या फर्क है जो हनुमान सहाय को बाकी लोगों से अलग बनाता है ? क्यों वो ऐसा कुछ कर जाते
हैं जिसके बारे में बाकी सोचते ही रह जाते हैं । दरअसल वो देखते हैं । जी हां देखने का मतलब सिर्फ देखना नहीं,बल्कि उस दर्द को ,उस मजबूरी को समझना भी है जो
कुछ लोगों के लिए हालातों की वजह रोज़ाना की सच्चाई है । हनुमान सहाय जैसे लोग देखते हैं और इस सच्चाई से आंखें नहीं फेरते । जैसे अधिकतर लोग सिग्नल पार करने के बाद कर लेते हैं

सोमवार, 23 नवंबर 2015

विंडो सीट से तमाशा-ए-ज़िंदगी देखते इम्तियाज़




फिल्म तमाशा  पहले विंडो सीट नाम से बन रही थी जिसे बाद में बदला गया । इम्तियाज़ प्रेम कहानियों को अपने अलग अंदाज़ में पेश करने के लिए जाने 
जाते है  । लेकिन अगर कोई इम्तियाज़ की पिछली फिल्मों पर नज़र डाले तो एक बात साफ दिखाई पड़ती है कि उनके फिल्मी व्याकरण का सबसे अहम हिस्सा है 
सफ़र । ऐसा सफर जो बाहर  सड़क से भौगोलिक दूरी को नापता है  लेकिन भीतर से इंसान को खुद के ही करीब लाता है ।  फिल्मी स्क्रीन के लिए बनाई गईं उनकी फिल्मों की कहानियां,डायलॉग,गाने , किरदार
सब अलग होते हैं लेकिन इन सब को   एक धागे में पिरोता है  खुद की खोज  का सफर जो हर कहानी में तय किया जाता है ।

कामयाबी और प्यार के बीच खुद को टटोलता रॉकस्टार का जॉर्डन । मर्सिडीज़ में घूमने वाली साउथ दिल्ली की वीरा  अपने मन की बात घरवालों से न कर उस हवा से करती है जिसे वो  हाईवे पर सटासट दौड़ते ट्रक के ऊपर चढ़ महसूस करती है 
 । जब वी मेट की गीत को तो अपनी ज़िंदगी की राह ही भारतीय रेल के सेंकेड क्लास डिब्बे में ही मिलती है ।  यानि खुद को पाने का अहसास खुद को खोने के बाद ही हुआ 


दरअसल इम्तियाज़ सूफी दर्शन की उस फिलॉस्फी को  बहुत गहराई से मानते हैं जिसमें खुद को पाने का रास्ता खुद को खोने के दौरान ही मिलता है  । ये जीवन 
दर्शन उनके फिल्मी व्याकरण में साफ दिखाई पड़ता है , हालांकि इसके लिए वो बेहद बारीक बिंबों का इस्तेमाल करते हैं वो भी काफी नफासत के साथ । 
उनकी सारी फिल्में भले ही बॉक्स ऑफिस पर बहुत ना चलें लेकिन इंसानी ज़हन की उधेड़बुन और भावनाओं की गहराई को लेकर  उनकी समझ को फिल्म आलोचक भी मानते हैं । 

ऐसे में जब वो अपनी आने वाली फिल्म तमाशा का ट्रेलर ही इस लाइन से शुरु करते हैं कि ' सारी कहानियां एक जैसी क्यों हो'  तो  ये उत्सुकता सहज ही मन में आती है कि 
इस बार वो कौन से बिंब का इस्तेमाल करेंगे ।  फिल्म की शूटिंग फ्रांस  और इटली के बीच कोर्सिका में हुई है । और कहते हैं कि इस कहानी का सिरा भी बाहर के सफर से भीतर की खोज तक बुना हुआ है ।
 
 इम्तियाज़ कहते भी हैं  तमाशा, बताने की एक कोशिश है की आप जो कहानियाँ सुनते है, जो आप के द्वारा बनाई गई है या आपके द्वारा चुनी गई है। जो कभी कभी आपसे जुड़ी हुई होती है।
 कभी जब आप भूल जाते हैं की आप कौन है और कोई आपको याद दिलाता है। यह कोई आसान काम नहीं है कि पूरी जिंदगी भर के किए अनुभव को हटा कर अपने आंतरिक शक्ति से जुड़ना।"


वैसै महाराष्ट्र में खुले में होने वाले नाटकों को तमाशा कहा जाता है जिनकी शुरुआत 16 वीं सदी में हुई थी । इनका दूसरा नाम था मनोरंजन 
 तो क्या फिल्मों के जरिए  खुद की खोज में निकले इम्तियाज़ का तमाशा उस दोहरी कसौटी पर खरा उतरेगा जिसे वो साधने की कोशिश कर रहे हैं ।
 इसके लिए तो इंतज़ार करना होगा लेकिन इससे  बेफिक्र वो जिंदगी की गाड़ी की विंडो सीट पर ही तमाशा-ए-ज़िंदगी देखने में मशगूल हैं और जैसे दुनियावी तौर तरीकों में खो चुके हर इंसान को कह रहे हों ...
"तमाशा खत्म मियां,अब तो मुखौटा उतार दो।" 

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

क्या विदर्भ का राह चल निकला है मालवा ?



''सफेद मक्खी का हमला ऐसा था जैसे कि पर्ल हार्बर पर बमों की बारिश , कोई कुछ समझ पाता इससे पहले सब बर्बाद हो गया । पंजाब के एक कपास किसान ने अपनी
 बर्बाद फसल का ऐसे ही शब्दों में शोक मनाया । पिछले दिनों कपास के खेतों में हुआ वो एक ऐसे बुरे सपने  के लौटने जैसा है जिसका दंश यहां की धरती पहले भी झेल चुकी है ।
 90 के दशक में कपास पर अमेरिकन सुंडी के अटैक से बर्बाद हुई खेती ने कुछ ऐसे ही हालात बनाए थे । ये अलग बात है कि इस बार नकली कीटनाशक ने तो किसानों को कहीं का ना छोड़ा ।
बर्बाद फसल ने कई घरों को बर्बाद कर डाला । लेकिन ये बात भी बहुत पुरानी बात नहीं जब 2002 में बीटी कॉटन को खेतों में उतारने के लिए खूब हो हल्ला किया गया था ।
 उसे हर मर्ज़ की दवा बताया गया था ।  दावा किया गया था कि बीटी कपास में बैसिलस-थरंजेनिफसिस का प्रत्यारोपण करने से एक विशेष प्रकार की सुंडी नहीं लगेगी ।
ज्यादा कीटनाशक नहीं डालने पड़ेंगे और  लागत कम पड़ेगी लिहाज़ा महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक कपास  किसान बी टी बीजों के सहारे ही खेती में जुट गए । लेकिन अब एक दशक बाद
विदर्भ को किसानों की कब्रगाह में तब्दील होते सबने देखा है । डर इस बात का है कि कहीं पंजाब इस खतरनाक सिलसिले की अगली कड़ी तो नहीं बन रहा है ।

एक आधिकारिक सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि पंजाब में  2000 से लेकर 2010 तक करीब 7 हज़ार किसानों ने खुदकुशी की है । 2010 के बाद भी किसानों की ये हताशा रुकी नहीं है ।
ये सारी आत्महत्याएं कर्ज के  दुष्चक्र  के चलते हुई हैं ऐसे में ये सवाल अपने में डराता है कि क्या पंजाब वाकई महाराष्ट्र की राह चल निकल पड़ा  , तो क्या कपास की बीटी बीजों से खेती
ऐसे हालातों के लिए बड़े तौर पर जिम्मेदार है ?  जानकारों की राय में बीटी कॉटन की खेती के एक दशक बाद ये साफ हो गया है  कि तात्कालिक रुप से ये किसानों के लिए
फायदे का सौदा हो सकता है लेकिन बाद में ये महंगी ही साबित होती है ।  सही है कि इस से सुंडी नहीं आई लेकिन दूसरी तरह की नई बीमारियों से ये खेती को बचा पाने में नाकमयाब साबित
हुई । महंगे रासायनिक स्प्रे के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल और दूसरे खर्चों ने महाजन के ऊपर  किसान की निर्भरता को खतरनाक तरीके से बढ़ा दिया है ।

ज्यादातर पंजाब के बठिंडा,मुक्तसर,फिरोज़पुर और फरीदकोट में बी टी कपास की खेती होती है । रासायनिक स्प्रे और कीटनाशकों ने यहां के पानी का ऐसा हाल कर दिया है कि कैंसर की बीमारी आम
हो चली है । बठिंडा से तो एक ट्रेन बीकानेर के लिए हर रोज़ चलती है, जिसे कैंसर एक्सप्रेस ही कहा जाने लगा है । बीकानेर के पास एक सरकारी कैंसर अस्पताल है,जहां सस्ता इलााज किया जाता है ।

लेकिन मूल सवाल वही है कि क्या खेती के व्यवसायीकरण ने बड़े पैमाने पर ऐसे हालात पैदा किए हैं कि जहां किसानों को खेती का रास्ता आत्महत्या कर तय करना पड़ रहा है ?  ऐसा क्यों देखने में आ रहा है कि
ज्यादातर वही किसान खुदकुशी करते दिख रहे हैं जो नकदी फसलों की खेती से जुड़े हुए हैं ?  गन्ना और कपास की खेती करने वाले महाराष्ट्र के किसानों का हर साल बढ़ता आंकड़ा इस बात की गवाही देता
है कि ये दरअसल ' मुनाफा ही सब कुछ है 'को मानने वाला अर्थतंत्र ही ऐसे हालात पैदा कर रहा है ।  खेती में मुनाफ़ा कमाने की सरकार की नीति ने ही किसानों के सामने ये रास्ता रख दिया है क्यों जानकार
इस बात की तस्दीक करते हैं कि आत्महत्याओं का ये सिलसिला 90 के दशक के उदारीकरण के बाद  पैदा हुआ ऐसा संकट है जो अब एक तल्ख सच्चाई की तरह आंखें मिला रहा है । पहले अकाल और सूखे से जूझने वाला
किसान ज़िंदगी की जंग इस तरह न हारता था जैसा आज देखने को मिल रहा है । 

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

कोई पूछने वाला क्यों नहीं ?


कुछ समय पहले आमिर खान और करीना कपूर की एक फिल्म आई थी तलाश । फिल्म में एक कॉल गर्ल सड़क दुर्घटना का शिकार हो जाती है और मर जाती है । कुछ सालों बाद अजीबोगरीब  एक्सिडेंट
के अनसुलझे केस सुलझाने के दौरान एक पुलिस वाले की मुलाकात  एक लड़की से होती है...जिससे उसे अपने केस के साथ-साथ उस कॉल गर्ल की मौत की असलियत भी पता चलती है । वो लड़की पुलिसवाले
बने आमिर खान से कहती है । ......................क्या साहेब इतना बड़ा शहर है मुंबई, लेकिन फिर भी एक लड़की एक रात गायब हो जाती है और कोई पूछने वाला भी नहीं कि वो कहां गई ?

शीना हत्याकांड में ये सवाल कितना मौजूं है ये इसी बात से पता चलता है कि 3 साल पहले गायब हुई एक लड़की की कितनी परवाह इस दुनिया को थी ....वो साफ़ हो गया । सबसे ज्यादा दुख इसी बात का है कि
उसके गायब होने के बाद उसकी गुमशुदगी को लेकर जो जवाब आ रहे हैं वो सदमे में डालने वाले हैं ।

 यूं शीना इस दुनिया में कोई अकेली नहीं थी । उसके नाना नानी, भाई ,सौतेला पिता,ब्वॉफ्रेंड, सहयोगी,दोस्त सब लोग थे । लेकिन ये कोई कैसे मान ले कि इनमें से किसी को नहीं पता कि वो लड़की एकाएक कहां चली गई
,और  उसे तलाशने की कोई कोशिश क्यों नहीं हुई  ?  उसके भाई मिखाइल ने कहा कि उसकी मां ने उसे बताया कि  वो अमेरिका में है पढ़ रही है ,यही जवाब उसकी सौतेली बहन विधि भी देती है ।
 2007 के बाद कई साल वो पीटर मुखर्जी के घर में रही लेकिन आज वो कहते हैं कि उन्हें नहीं मालूम कि शीना कहां है ?  सवाल ये कि हो सकता है कि करीबी लोगों के दावों पर अब भरोसा नहीं किया जा सकता
क्योंकि गिरफ्तारी का फंदा जिस तरह से सभी पर कस रहा है उस को लेकर इस बात पर यकीन करना मुश्किल है कि  वो कितना सच और कितना झूठ बोल रहे हैं ।


लेकिन असल सवाल उस दुनिया से है जिसे हमें अपने आस-पास नज़रों में तो पाते हैं...लेकिन शायद वो आभासी ही है । परिवार के लोगों के अलावा हर शख्स की ज़िंदगी में बाहर की लोगों ,जान
पहचान वालों , सहकर्मियों की भी एक मौजूदगी अप्रत्यक्ष रुप से होती ही है । कोई बिरला ही अंतर्मुखी होगा जिसका कोई दोस्त या संगी ,साथी न हो । शीना की ज़िंदगी में भी ऐसे लोग थे ।

....क्या वो दोस्त....रिश्तेदार .....सहकर्मी जो शीना को थोड़ा बहुत भी जानते थे कोशिश नहीं कर सकते थे जानने  कि आखिरकार शीना गई तो गई कहां । ये कैसे संभव है कि कोई शख्स
रातोंरात ये फैसला ले ले कि उसे अगली सुबह विदेश जाकर पढ़ाई करनी है और फिर उसकी कोई खोज खबर न मिले ...क्या ऐसे में किसी को शक नहीं होगा.....
क्या किसी भी आम आदमी के ज़हन में ये सवाल नहीं आएंगे कि वो कहां गई । शीना की जनरेशन के लोग सोशल मीडिया पर बहुत एक्टिव रहते हैं ....लेकिन कहा जा रहा है कि  उसकी फेसबुक पर भी काफी समय से कोई पोस्ट नहीं थी ...फिर क्यों नहीं किसी के जहन में आया कि पोस्ट क्यों नहीं की गई ।

हालांकि अब शीना के कुछ दोस्त सामने आए और उन्होंने माना कि उस वक्त उनके ज़हन में भी इस तरह के सवाल आए थे...लेकिन तो वो क्या मजबूरी है जिसके चलते
वो खामोश रह गए । दरअसल इसमें दोष शीना के दोस्तों का नहीं....उस एकाकीपन का है जिसे व्यक्तिगत स्वच्छंदता के नाम पल इस समाज ने सहज ही खुद पर ओढ़ लिया है ।
जहां लोग परवाह तो करते हैं लेकिन एक दायरे में ही है । हाल-चाल भी पूछते हैं । सामने वाला भी झूठा जवाब देता है कि अच्छे हैं । जब संवाद ऐसे सिंथेटिक हो तो आत्मीयता और परवाह कहां से होगी ।


तो क्या प्राइवेसी के नाम पर हमने अपने इर्द गिर्द एक ऐसा दायरा बना लिया है,जिसके आर-पार न तो हम जाना चाहते हैं ना दूसरों की करीब आने की इजाज़त देते हैं । सामूहिकता,सहभागिता
और सहजीवन क्या कहीं पीछे छूट गए हैं । सोशल मीडिया पर दिखने वाले लाइक्स और शेयर असल ज़िंदगी के एकाकीपन को और उघाड़ रहे हैं । तो क्या वाकई शीना इस आभासी दुनिया में
अकेली ही थी ? शायद